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  • AMCA फाइटर जेट परियोजना में HAL बाहर, टाटा-L&T-भारत फोर्ज आगे

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    भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ आ गया है, जिसमें देश का पहला स्वदेशी 5वीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट विकसित करने के लिए तीन प्रमुख निजी कंपनियां आगे आई हैं, जबकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) इस दौड़ से बाहर हो गया है। यह फैसला देश के रक्षा निर्माण क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है।

    कौन हैं मुख्य दावेदार?

    रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान तकनीकी मूल्यांकन के बाद टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड, लार्सन & टुब्रो (L&T) और भारत फोर्ज को AMCA कार्यक्रम के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। ये तीनों कंपनियां अब एफ्लाइट प्रोटोटाइप विकसित करने और विमान के निर्माण के लिए अंतिम व्यापारिक प्रस्ताव तैयार करेंगी, जिनके आधार पर अगले 3 महीनों के भीतर फाइनल चयन किया जाएगा।

    यह निर्णय HAL के लिए खासा बड़ा है क्योंकि परंपरागत रूप से यह सरकारी विमान निर्माता ही भारत के प्रमुख रक्षा और विमान निर्माण कार्यक्रमों का नेतृत्व करता रहा था। लेकिन इस बार निजी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में यह जगह नहीं बना पाया।

    प्रोटोटाइप और समय-सीमा

    आधिकारिक और विश्लेषण स्रोतों के आधार पर पहले AMCA प्रोटोटाइप के तैयार होने की उम्मीद अगले 3-4 वर्षों के भीतर की जा रही है, यानी यह 2028-29 के आसपास उड़ान परीक्षण के लिए तैयार हो सकता है। इसके बाद विस्तृत परीक्षण, प्रमाणन और उत्पादित करने की प्रक्रिया चलेगी, और वायुसेना में शामिल होने की संभावना मध्य-2030 के दशक की तरफ़ जाती है।

    इस बड़ी परियोजना के लिए सरकार ने अनुमानित बजट लगभग ₹15,000 करोड़ रखा है, जो प्रोटोटाइप चरण और शुरुआती कार्यों को कवर करेगा। आगे हो सकने वाली बड़े ऑर्डर और निर्माण कार्य इसके कई गुना से ऊपर की लागत पर हो सकता है।

    स्ट्रैटेजिक बदलाव का संकेत

    इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि भारत डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में निजी क्षेत्र को अधिक अवसर देना चाहता है और HAL के एकाधिकार को खत्म कर प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा देना चाहता है। AMCA जैसे उन्नत स्टेल्थ विमान के लिए नए तकनीकी दृष्टिकोण, उत्पादन क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की तैयारी भी इसी नीति का हिस्सा हैं।

    निजी कंपनियों की भागीदारी से उम्मीद है कि परियोजना में रफ्तार आएगी और भारत की रक्षा निर्माण क्षमताओं में वृद्धि होगी, जिससे भविष्य में रक्षा निर्यात और आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा।

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