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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, और बुधवार को शीर्ष अदालत में इसकी सुनवाई शुरू हुई। मामला राजनीतिक और संवैधानिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि यह आगामी चुनावों से पहले मतदाता पहचान प्रक्रिया पर प्रतिस्पर्धा और अधिकारों के संरक्षण को लेकर तनाव को दर्शाता है।
क्या है SIR विवाद का मूल मुद्दा?
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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और उचित परामर्श का अभाव है और इसके कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाया जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों को खतरा हो सकता है।
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उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता सूचियों के संशोधन में “तार्किक विसंगतियों” (logical discrepancies) के आधार पर वैध मतदाताओं को डिलीट किया जा रहा है और यह प्रक्रिया राज्य के मतदाताओं को निशाना बनाती है।
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सीएम ने SIR को “लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ” बताते हुए कहा कि इस तरह के संशोधन से वास्तविक मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गलतियाँ हो रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: क्या हुआ आज?
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आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की बेंच ने मामले को सुना और ECI तथा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी किया है।
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अदालत ने तर्क दिया है कि मतदाता सूची संशोधन के दौरान गुणवत्ता और न्यायसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित होना आवश्यक है और वैध मतदाताओं का हक सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
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सुनवाई में ममता के अधिवक्ताओं ने कुछ तकनीकी और कानूनी मुद्दों पर जोर दिया है और कहा कि सूचियों के संशोधन के बिना पर्याप्त दिशा-निर्देश और वैधता के अभाव में मतदाता अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
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मामला अगली सुनवाई के लिए 9 फरवरी 2026 को सूचीबद्ध हुआ है।
ममता बनर्जी का बयान और आरोप
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ममता बनर्जी खुद अपनी एलएलबी डिग्री के आधार पर केस में बहस कर सकती हैं, जिससे यह एक असामान्य और उच्च स्तरीय प्रत्यक्ष भागीदारी प्रतीत होती है।
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उन्होंने चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर कार्रवाई करने, और मतदाता सूची को राजनीतिक रूप से प्रभावित करने का आरोप लगाया है।
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ममता ने यह भी कहा है कि SIR प्रक्रिया के कारण कई जिंदा लोगों को मृतक के रूप में चिह्नित किया गया है, जिससे उनके मतदाता अधिकार खतरे में पड़ रहे हैं।
राजनीतिक और संवैधानिक परिदृश्य
यह मामला न केवल पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच प्रत्यक्ष घमासान का प्रतीक है, बल्कि यह मतदाता अधिकारों के संरक्षण, निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता, और राज्य-केंद्र संबंधों पर भी कानूनी और राजनीतिक बहस को गहरा कर रहा है।








