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तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Edappadi K. Palaniswami के नेतृत्व वाली All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam अब गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। पार्टी के 30 विधायकों ने उनके नेतृत्व के खिलाफ खुलकर बगावत कर दी है और Joseph Vijay की अगुवाई वाली Tamilaga Vettri Kazhagam सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है।
बताया जा रहा है कि बगावती गुट का नेतृत्व एसपी वेलुमणि और सीवी शणमुगम कर रहे हैं। इन नेताओं ने विधानसभा में पलानीस्वामी के नाम का समर्थन करने से इनकार कर दिया। इसके बाद तमिलनाडु विधानसभा में दोनों गुटों को अलग-अलग बैठने की व्यवस्था दी गई है, जिससे पार्टी के भीतर विभाजन साफ दिखाई देने लगा है।
AIADMK को 2019 के बाद से लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। 2026 विधानसभा चुनाव में पार्टी तीसरे स्थान पर पहुंच गई, जिसके बाद पार्टी के अंदर पलानीस्वामी की रणनीति और नेतृत्व पर सवाल खड़े होने लगे। बागी नेताओं का आरोप है कि पलानीस्वामी सत्ता हासिल करने के लिए डीएमके के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने की कोशिश कर रहे थे, जो पार्टी की मूल विचारधारा के खिलाफ है।
दरअसल, AIADMK की राजनीति हमेशा से M. G. Ramachandran और J. Jayalalithaa की विरासत पर आधारित रही है, जहां डीएमके को प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा है। ऐसे में डीएमके के साथ किसी भी प्रकार के सहयोग की संभावना ने पार्टी कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पलानीस्वामी की “I, Me, Myself” राजनीति अब पार्टी के लिए बोझ बनती जा रही है। यही वजह है कि पार्टी का बड़ा वर्ग अब नए नेतृत्व की मांग कर रहा है।
दूसरी तरफ बगावती गुट ने एक नई रणनीति अपनाई है। उनका कहना है कि जनता ने TVK पार्टी को नहीं बल्कि मुख्यमंत्री विजय को जनादेश दिया है। इसके जरिए वे विजय सरकार में खुद के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अब तक विजय ने इस प्रस्ताव को लेकर कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिए हैं।
विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बगावती AIADMK नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हुए हैं। एसपी वेलुमणि पर 98 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार मामले की जांच चल रही है, जबकि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सी विजयभास्कर कथित गुटखा घोटाले में जांच के घेरे में हैं। ऐसे में उनके साथ गठबंधन करना विजय की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
उधर, AIADMK की स्थिति अब अस्तित्व के संकट जैसी बनती जा रही है। पार्टी का पारंपरिक महिला वोट बैंक धीरे-धीरे विजय की ओर खिसकता दिख रहा है। वहीं पलानीस्वामी खुद को M. K. Stalin के विकल्प के तौर पर स्थापित करने में विफल रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि AIADMK में अब बड़ा विभाजन लगभग तय माना जा रहा है। पार्टी के चुनाव चिन्ह “दो पत्तियां” को लेकर एक बार फिर कानूनी लड़ाई छिड़ सकती है। इससे पहले 1987 में M. G. Ramachandran के निधन के बाद भी पार्टी में बड़ा विभाजन हुआ था।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच Bharatiya Janata Party की भूमिका पर भी नजरें टिकी हुई हैं। चुनाव नतीजों के बाद यह साफ हो गया है कि AIADMK के साथ गठबंधन बीजेपी के लिए भी ज्यादा फायदेमंद साबित नहीं हुआ। ऐसे में अब बीजेपी तमिलनाडु में खुद को स्वतंत्र ताकत के रूप में मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकती है।








