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  • पुरानी दिल्ली में भारत-ताइवान साहित्यिक संवाद: शब्दों से जुड़ी दो संस्कृतियों की आत्मीय यात्रा

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    पुरानी दिल्ली की गलियों में इस बार न सिर्फ इत्र और परांठों की खुशबू थी, बल्कि शब्दों और विचारों की महक भी फैली हुई थी। दरअसल, राजधानी के ऐतिहासिक हिस्से में भारत-ताइवान साहित्यिक संवाद (Taiwan-India Literary Dialogue) का आयोजन हुआ, जिसने दो देशों के बीच सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान का नया अध्याय रच दिया।

    इस आयोजन का मकसद था — साहित्य को कूटनीति से जोड़ना और लेखन के ज़रिए दो सभ्यताओं के बीच पुल बनाना। भारत और ताइवान के कई प्रमुख लेखक, कवि, अनुवादक और विचारक इस कार्यक्रम में शामिल हुए। आयोजन स्थल को खासतौर पर “पुरानी दिल्ली की आत्मा” को महसूस कराने के लिए सजाया गया था, ताकि मेहमान ताइवान से आई साहित्यिक प्रतिनिधिमंडली को भारतीय परंपरा, स्वाद और संवेदना का प्रत्यक्ष अनुभव मिल सके।

    कार्यक्रम की शुरुआत भारत की वरिष्ठ कवयित्री द्वारा हिंदी कविता पाठ से हुई, जिसे ताइवान के अनुवादक ने मंदारिन में प्रस्तुत किया। इस अनूठे प्रस्तुतीकरण ने यह साबित किया कि भाषा अलग हो सकती है, लेकिन भावनाओं की भाषा एक ही होती है। इसके बाद ताइवान के प्रसिद्ध लेखक ली चेंग-हाओ ने अपने उपन्यास ‘Whispers of the Island’ से एक अंश सुनाया, जिसमें उन्होंने पहचान, प्रवास और स्मृति के विषयों पर बात की।

    इस संवाद का आयोजन इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (ICCR) और ताइवान कल्चरल ऑफिस के सहयोग से किया गया था। कार्यक्रम के दौरान कई पैनल चर्चाएं आयोजित की गईं, जिनमें “आधुनिकता और परंपरा के बीच का संवाद”, “अनुवाद की राजनीति” और “एशियाई लेखन में स्त्री स्वर” जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।

    दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साहित्य विभागों के कई छात्र और प्रोफेसर भी इस आयोजन का हिस्सा बने। उन्होंने भारतीय और ताइवानी लेखन पर अपने दृष्टिकोण साझा किए और दोनों भाषाओं के बीच अनुवाद की जटिलताओं पर सवाल उठाए।

    पुरानी दिल्ली की गलियों के बीच यह आयोजन इस मायने में भी विशेष रहा कि इसे सांस्कृतिक अनुभव का रूप दिया गया था। मेहमानों को लाल किला, जामा मस्जिद और चांदनी चौक की यात्रा कराई गई, जहां उन्होंने भारतीय जीवन की विविधता और ऐतिहासिक गहराई को नज़दीक से महसूस किया। शाम को एक विशेष कवि सम्मेलन और संगीत प्रस्तुति ने वातावरण को और भी जीवंत बना दिया।

    कार्यक्रम में मौजूद ताइवान के सांस्कृतिक प्रतिनिधि ने कहा,
    “भारत और ताइवान दोनों की परंपरा में कहानी कहने और कविता का गहरा महत्व है। यह संवाद केवल साहित्य तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारे समाजों के दिलों को जोड़ने का प्रयास है।”

    भारतीय लेखिका और साहित्य आलोचक अनामिका वर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह संवाद “एक नई एशियाई साहित्यिक पहचान” की ओर बढ़ने का संकेत है, जहां पश्चिम की परिभाषाओं से परे, दो प्राचीन सभ्यताएं अपने शब्दों के ज़रिए अपनी आधुनिकता को परिभाषित कर रही हैं।

    इस कार्यक्रम में कई साहित्यिक अनुवाद परियोजनाओं की भी घोषणा की गई। इनमें हिंदी, तमिल और बंगाली साहित्य के चयनित कार्यों का मंदारिन में और ताइवानी साहित्यिक कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया जाएगा। आयोजकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के ज़रिए दोनों देशों के पाठकों को एक-दूसरे की रचनाओं तक पहुंचने का अवसर मिलेगा।

    साहित्यिक संवाद के अंतिम सत्र में भारत और ताइवान के युवा लेखकों ने “लघु कहानियों के आदान-प्रदान” कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसमें दोनों देशों के रचनाकार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक-दूसरे की कहानियों का अनुवाद और साझा करेंगे।

    पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक परिवेश में आयोजित यह कार्यक्रम एक सांस्कृतिक संगम बन गया — जहां गलियां इतिहास कह रही थीं, हवाएं कविता सुन रही थीं, और दो देशों के लेखक एक साझा भविष्य लिख रहे थे।

    कला और संस्कृति के जानकारों का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रम न केवल साहित्य को वैश्विक संवाद का हिस्सा बनाते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि कूटनीति अब केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय स्तर पर भी संभव है

    पुरानी दिल्ली का यह साहित्यिक संगोष्ठी इस बात का प्रतीक बन गई कि जब दो सभ्यताएं शब्दों के ज़रिए मिलती हैं, तो वे केवल संवाद नहीं, बल्कि समझ और संवेदना की नई भाषा रचती हैं।

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